कर्पूरगौरं करुणावतारं मंत्र क्या है?
हिंदू सनातन धर्म में पूजा-पाठ के दौरान मंत्रोच्चारण का अत्यंत महत्व माना गया है। इन्हीं में से एक है “कर्पूरगौरं करुणावतारं…” मंत्र, जिसे विशेष रूप से भगवान शिव की स्तुति में गाया जाता है। मान्यता है कि इस मंत्र की रचना भगवान विष्णु ने माता पार्वती से विवाह के अवसर पर शिवजी की प्रशंसा में की थी।
यह मंत्र पूजा के अंत में, आरती के पश्चात अवश्य गाया जाता है और शिव भक्त इस मंत्र को बहुत शुभ मानते हैं।
मंत्र क्या है?
कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम् ।
सदा वसन्तं हृदयारबिन्दे भवं भवानीसहितं नमामि ।।
कर्पूरगौरं करुणावतारं मंत्र का शब्दार्थ
1. कर्पूरगौरं
कर्पूर (कपूर) की तरह उज्ज्वल और गौर वर्ण वाले।
2. करुणावतारं
जो करुणा और दया के साक्षात अवतार हैं।
3. संसारसारं
जो सम्पूर्ण सृष्टि के सार और आधार हैं।
4. भुजगेन्द्रहारम्
जिनके गले में सर्पों की माला (नागहार) सुशोभित है।
5. सदा वसन्तं हृदयारबिन्दे
जो सदैव भक्तों के हृदय रूपी कमल में विराजमान रहते हैं।
6. भवं भवानीसहितं नमामि
मैं भगवान शिव और माता भवानी को प्रणाम करता/करती हूँ।
मंत्र का सार
इस स्तुति में भगवान शिव के सुंदर, शांत, दिव्य और करुणामय स्वरूप का वर्णन किया गया है। मंत्र का संपूर्ण अर्थ है:
“जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले, करुणा के अवतार, संसार के सार हैं और जिनके गले में नागों का हार सुशोभित है, वे भगवान शिव माता भवानी सहित मेरे हृदय में सदैव निवास करें – उन्हें मेरा नमन।”
पूजा के बाद कर्पूरगौरं मंत्र का विशेष महत्व
1. शिव के दिव्य स्वरूप का स्मरण
भगवान शिव को भस्माधारी, त्रिनेत्र और तांडवकर्ता के रूप में देखा जाता है, जो कि श्मशान के निवासी हैं। यह मंत्र उनके शांत, गौर वर्ण और सौम्य रूप की याद कराता है।
2. पूजा का शुभ समापन
मंदिरों और घरों में आरती के बाद इस मंत्र का उच्चारण पूजा को पूर्ण और मंगलकारी बनाता है।
3. ऊर्जा और सकारात्मक कंपन
मंत्रोच्चारण से शरीर में सकारात्मक स्पंदन उत्पन्न होते हैं, जिससे मानसिक शांति और ऊर्जा का संचार होता है।
4. शिव – शक्ति का आह्वान
मंत्र में शिव और माता पार्वती दोनों का आह्वान है, जिससे भक्त को दिव्य आशीर्वाद प्राप्त होने की मान्यता है।
5. भगवान् विष्णु द्वारा गाया गया स्तोत्र
कथाओं के अनुसार माता पार्वती और भगवान शिव के विवाह के समय स्वयं भगवान् विष्णु ने यह स्तुति गाई थी, जिससे इसका आध्यात्मिक महत्त्व और भी बढ़ जाता है।
क्यों कहा जाता है कि यह मंत्र पूजा को पूर्ण करता है?
हिंदू धर्म में प्रत्येक पूजा के अंत में भगवान की स्तुति का उच्चारण आवश्यक माना गया है। चूंकि भगवान शिव को जीवन-मरण का अधीश्वर माना जाता है, इसलिए पूजा के बाद उनके सौम्य स्वरूप की प्रशंसा में गाया गया यह मंत्र शुभता, सुरक्षा और शांति प्रदान करता है। इसीलिए इसे पूजा का अंतिम और अनिवार्य मंत्र माना जाता है।
