ढाका। बांग्लादेश की राजनीति की सबसे प्रभावशाली शख्सियतों में शुमार, तीन बार प्रधानमंत्री रहीं और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की अध्यक्ष बेगम खालिदा ज़िया का मंगलवार सुबह निधन हो गया। वह 80 वर्ष की थीं और बीते कई दिनों से ढाका के एवरकेयर अस्पताल में इलाजरत थीं। पार्टी की ओर से जारी बयान के अनुसार, उन्होंने सुबह करीब 6 बजे अंतिम सांस ली।
खालिदा ज़िया पिछले 36 दिनों से अस्पताल में भर्ती थीं। उन्हें हृदय और फेफड़ों में संक्रमण के साथ-साथ निमोनिया की शिकायत थी। उनकी बिगड़ती हालत को देखते हुए उन्हें विदेश ले जाने की कोशिश भी हुई, लेकिन नाजुक स्वास्थ्य के कारण यह संभव नहीं हो सका।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जताया शोक
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खालिदा ज़िया के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री के रूप में उनके योगदान और भारत-बांग्लादेश संबंधों को मजबूत करने में उनकी भूमिका को हमेशा याद किया जाएगा। पीएम मोदी ने 2015 में ढाका में उनसे हुई अपनी मुलाकात को भी याद किया और उनके परिवार व बांग्लादेश की जनता के प्रति संवेदना प्रकट की।
राजनीतिक सफर: गृहिणी से सत्ता के शिखर तक
1945 में तत्कालीन ब्रिटिश भारत के जलपाईगुड़ी (अब पश्चिम बंगाल) में जन्मी खालिदा ज़िया का बचपन और शिक्षा दिनाजपुर में हुई। 1960 में उन्होंने पाकिस्तान सेना के अधिकारी जियाउर रहमान से विवाह किया। 1971 के मुक्ति संग्राम में जियाउर रहमान ने अहम भूमिका निभाई और बाद में बांग्लादेश के राष्ट्रपति बने।
30 मई 1981 को जियाउर रहमान की हत्या के बाद बीएनपी संकट में थी। उसी दौर में राजनीति से दूर रहीं खालिदा ज़िया पार्टी में सक्रिय हुईं। 1984 में वह बीएनपी की अध्यक्ष बनीं और 1991 के आम चुनाव में जीत दर्ज कर बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं।
लोकतांत्रिक सुधारों की पहचान
खालिदा ज़िया के कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धियों में बांग्लादेश में संसदीय प्रणाली की बहाली, कार्यवाहक सरकार व्यवस्था की शुरुआत, विदेशी निवेश पर लगे प्रतिबंधों को हटाना और प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य व निःशुल्क करना शामिल रहा। वह तीन बार-1991, 1996 और 2001-प्रधानमंत्री बनीं और लंबे समय तक देश की राजनीति की धुरी रहीं।
‘बैटलिंग बेगम्स’ और कटु राजनीति
खालिदा ज़िया और अवामी लीग प्रमुख शेख हसीना की प्रतिद्वंद्विता बांग्लादेश की राजनीति का सबसे चर्चित अध्याय रहा। दोनों ने 1990 में मिलकर सैन्य शासक एर्शाद के खिलाफ आंदोलन किया, लेकिन बाद में उनकी दुश्मनी इतनी बढ़ी कि उन्हें “बैटलिंग बेगम्स” कहा जाने लगा। इस टकराव का असर बांग्लादेश की राजनीति, अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिरता पर भी पड़ा।
विवाद, जेल और बीमारी
2001-06 के कार्यकाल में उग्रवाद और भ्रष्टाचार के आरोपों ने उनकी सरकार को घेरा। 2018 में एक भ्रष्टाचार मामले में उन्हें जेल हुई, हालांकि उन्होंने आरोपों को राजनीतिक साजिश बताया। बिगड़ती सेहत के चलते 2020 में उन्हें घर में नजरबंद किया गया और अगस्त 2024 में शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद वह मुक्त हुईं। 2025 की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें भ्रष्टाचार के मामले में बरी कर दिया।
जियाउर रहमान की हत्या और राजनीतिक विरासत
उनके पति जियाउर रहमान की 1981 में चटगांव में हुई हत्या आज भी बांग्लादेश के इतिहास की सबसे सनसनीखेज घटनाओं में गिनी जाती है। हाल ही में, 19 साल के निर्वासन के बाद उनके बेटे तारीक रहमान की बांग्लादेश वापसी और पिता की समाधि पर श्रद्धांजलि ने एक बार फिर ज़िया परिवार को राष्ट्रीय चर्चा में ला दिया है।
एक युग का अंत
बेगम खालिदा ज़िया का निधन बांग्लादेश की राजनीति में एक युग के अंत के रूप में देखा जा रहा है। समर्थकों के लिए वह लोकतंत्र और संघर्ष की प्रतीक थीं, वहीं आलोचकों के लिए विवादों से घिरी नेता। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि उन्होंने बांग्लादेश की राजनीति को दशकों तक दिशा दी।उनका जीवन, संघर्ष और विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए इतिहास का अहम अध्याय रहेगा।
