नई दिल्ली। दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में शामिल अरावली को लेकर जारी कानूनी और पर्यावरणीय विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया है। शीर्ष अदालत ने 20 नवंबर को अरावली पर्वतमाला की परिभाषा को लेकर दिए गए अपने ही आदेश को अगली सुनवाई तक के लिए स्थगित कर दिया है। मामले की विस्तृत सुनवाई अब 21 जनवरी 2026 को होगी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने स्पष्ट किया कि जब तक परिभाषा से जुड़े सभी तकनीकी और पारिस्थितिक पहलुओं पर स्पष्टता नहीं आ जाती, तब तक नवंबर का आदेश लागू नहीं किया जाएगा।
अपने ही आदेश पर क्यों लगाई रोक?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट और अदालत की पिछली टिप्पणियों को अलग-अलग तरीके से व्याख्यायित किया जा रहा है, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा हुई है। पीठ ने कहा कि किसी भी दिशा-निर्देश को लागू करने से पहले निष्पक्ष, स्वतंत्र और डोमेन विशेषज्ञों की राय पर विचार आवश्यक है, ताकि कोई स्थायी संरचनात्मक या पर्यावरणीय नुकसान न हो।
सरकार से सुप्रीम कोर्ट के 5 अहम सवाल
कोर्ट ने केंद्र सरकार से नवंबर के आदेश को लागू करने से पहले पांच बुनियादी सवालों पर जवाब मांगा है-
a. क्या अरावली की परिभाषा को 500 मीटर के दायरे तक सीमित करने से संरक्षण क्षेत्र संकुचित होकर एक संरचनात्मक विरोधाभास पैदा होता है?
b. क्या इससे गैर-अरावली क्षेत्रों का दायरा बढ़ेगा, जहां विनियमित खनन की अनुमति मिल सकती है?
c. क्या 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली दो पहाड़ियों के बीच 700 मीटर तक के अंतराल में खनन की अनुमति दी जानी चाहिए?
d. अरावली की पारिस्थितिक निरंतरता को कैसे सुनिश्चित किया जाएगा?
e. यदि नियामक खामियां सामने आती हैं, तो क्या पूरी पर्वत श्रृंखला की संरचनात्मक अखंडता को बनाए रखने के लिए व्यापक मूल्यांकन जरूरी होगा?
हाई-पावर्ड विशेषज्ञ समिति के गठन का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि अब एक उच्च-स्तरीय विशेषज्ञ समिति गठित की जाएगी, जिसमें भूविज्ञान, पर्यावरण, वन और पारिस्थितिकी के डोमेन विशेषज्ञ शामिल होंगे। यह समिति मौजूदा रिपोर्ट का पुनः विश्लेषण करेगी, सभी अस्पष्टताओं को दूर करेगी और अपनी सिफारिशें अदालत के समक्ष रखेगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस प्रक्रिया में सार्वजनिक परामर्श को भी शामिल किया जाएगा।
क्या है अरावली की परिभाषा को लेकर विवाद?
अरावली पर्वतमाला को लेकर लंबे समय से विभिन्न राज्यों और एजेंसियों की अलग-अलग परिभाषाएं लागू रही हैं। इसी असमानता को दूर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर पर्यावरण मंत्रालय, भारतीय वन सर्वेक्षण, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, राज्य वन विभागों और केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) की एक संयुक्त समिति बनाई गई थी। 20 नवंबर को कोर्ट ने इसी समिति की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए नई परिभाषा को मंजूरी दी थी, लेकिन अब उसी परिभाषा पर सवाल खड़े हो गए हैं।
नई परिभाषा में क्या प्रस्तावित था?
नई परिभाषा के अनुसार-
a. स्थानीय भू-स्तर से 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली का हिस्सा नहीं माना जाएगा।
b. केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊंची पहाड़ियां ही अरावली में शामिल होंगी।
c. 500 मीटर के दायरे में स्थित दो या अधिक ऐसी पहाड़ियों को संयुक्त रूप से अरावली माना जाएगा।
सरकार का तर्क था कि इससे पूरे देश में अरावली की एक समान परिभाषा लागू हो सकेगी।
नई परिभाषा का विरोध क्यों?
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि इस परिभाषा के लागू होने से अरावली क्षेत्र का बड़ा हिस्सा कानूनी संरक्षण से बाहर हो सकता है। आलोचकों के अनुसार, इससे खनन गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा और अरावली की वह प्राकृतिक दीवार कमजोर हो सकती है, जो थार रेगिस्तान को गंगा के मैदानी इलाकों की ओर बढ़ने से रोकती है। राजस्थान में इस परिभाषा को लेकर सबसे अधिक विरोध दर्ज किया गया है।
आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और अरावली से जुड़े चार राज्यों- दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
नवंबर के आदेश और समिति की सिफारिशें अगली सुनवाई तक स्थगित रहेंगी। अब सभी की निगाहें 21 जनवरी की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां अरावली की भविष्य की कानूनी परिभाषा और उसके संरक्षण की दिशा तय होगी।
